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कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (CBD)

कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (CBD) एक बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय संधि (multilateral international treaty) है जिसे ..

कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (CBD)

Avinash
March 17, 2025

कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (CBD) क्या है? यह किस प्रकार की अंतर्राष्ट्रीय संधि (international treaty) है?🔗

कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (CBD)
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कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी (CBD) एक बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय संधि (multilateral international treaty) है जिसे जैव विविधता (biological diversity) के संरक्षण (conservation), इसके घटकों (components) के सतत उपयोग (sustainable use), और आनुवंशिक संसाधनों (genetic resources) के उपयोग से होने वाले लाभों के निष्पक्ष और न्यायसंगत बंटवारे (fair and equitable sharing of benefits) को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

  • उत्पत्ति (Origin): इसे 1992 में रियो डी जनेरियो (Rio de Janeiro) में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit) या यूनाइटेड नेशन्स कॉन्फ्रेंस ऑन एन्वायरमेंट एंड डेवलपमेंट (UNCED) में हस्ताक्षर के लिए खोला गया था और यह 29 दिसंबर 1993 को लागू हुआ।
  • कानूनी प्रकृति (Legal Nature): यह कानूनी रूप से बाध्यकारी (legally binding) संधि है। इसका मतलब है कि जिन देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं और इसकी पुष्टि (ratify) की है (जिन्हें 'पार्टीज़' कहा जाता है), वे इसके प्रावधानों को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। उन्हें अपनी राष्ट्रीय रणनीतियों (national strategies) और कानूनों में CBD के उद्देश्यों को शामिल करना होता है।
  • स्कोप (Scope): इसका दायरा बहुत व्यापक है, जिसमें इकोसिस्टम (ecosystems), प्रजातियाँ (species), और आनुवंशिक संसाधन (genetic resources) सभी शामिल हैं। यह बायोटेक्नोलॉजी (biotechnology) से संबंधित मुद्दों को भी संबोधित करता है, खासकर कार्टाजेना प्रोटोकॉल (Cartagena Protocol) के माध्यम से।

संक्षेप में, CBD जैव विविधता के सभी पहलुओं को संबोधित करने वाला एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो संरक्षण के साथ-साथ विकास और इक्विटी (equity) के मुद्दों को भी एकीकृत (integrate) करता है।

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CBD के तीन मुख्य उद्देश्य (main objectives) क्या हैं और उनका विस्तार से वर्णन करें?🔗

CBD के तीन मुख्य और परस्पर जुड़े हुए उद्देश्य हैं, जैसा कि इसके अनुच्छेद 1 (Article 1) में बताया गया है:

  1. जैव विविधता का संरक्षण (Conservation of Biological Diversity):

    • अर्थ: इसका मतलब है पृथ्वी पर जीवन की विविधता - इकोसिस्टम, प्रजातियों और आनुवंशिक स्तरों पर - को क्षरण (degradation) और विलुप्ति (extinction) से बचाना।
    • कैसे हासिल किया जाता है: इसमें इन-सीटू संरक्षण (in-situ conservation) शामिल है, यानी प्रजातियों और इकोसिस्टम को उनके प्राकृतिक आवासों (natural habitats) में संरक्षित करना (जैसे राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य बनाना)। इसमें एक्स-सीटू संरक्षण (ex-situ conservation) भी शामिल है, यानी प्रजातियों के घटकों को उनके प्राकृतिक आवासों के बाहर संरक्षित करना (जैसे जीन बैंक, बीज बैंक, वनस्पति उद्यान, चिड़ियाघर)।
    • उदाहरण: भारत में 'प्रोजेक्ट टाइगर' (Project Tiger) बाघों और उनके आवासों का इन-सीटू संरक्षण का एक प्रमुख उदाहरण है। राष्ट्रीय जीन बैंक (National Gene Bank) एक्स-सीटू संरक्षण का उदाहरण है।
  2. जैव विविधता के घटकों का सतत उपयोग (Sustainable Use of the Components of Biological Diversity):

    • अर्थ: इसका मतलब है जैविक संसाधनों (biological resources) का इस तरह से उपयोग करना कि वे वर्तमान पीढ़ी की जरूरतों को पूरा करें, लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की जरूरतों को पूरा करने की उनकी क्षमता को कम न करें। यह सुनिश्चित करता है कि उपयोग की दर (rate of use) संसाधन के पुनर्जनन (regeneration) की क्षमता से अधिक न हो।
    • कैसे हासिल किया जाता है: इसमें टिकाऊ कृषि (sustainable agriculture), वानिकी (forestry), मत्स्य पालन (fisheries) और वन्यजीव प्रबंधन (wildlife management) जैसी प्रथाएं शामिल हैं। इसमें इको-टूरिज्म (eco-tourism) जैसे गैर-उपभोग्य उपयोग (non-consumptive uses) भी शामिल हो सकते हैं।
    • उदाहरण: भारत में, गैर-इमारती वन उत्पाद (Non-Timber Forest Products - NTFPs) जैसे शहद, बांस, औषधीय पौधों का समुदायों द्वारा सतत रूप से संग्रह और उपयोग, सतत उपयोग का एक उदाहरण हो सकता है, बशर्ते इसे सही ढंग से प्रबंधित किया जाए। संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management - JFM) कार्यक्रम भी वनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देने का एक प्रयास है।
  3. आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों का निष्पक्ष और न्यायसंगत बंटवारा (Fair and Equitable Sharing of Benefits Arising out of the Utilization of Genetic Resources - ABS):

    • अर्थ: यह तीसरा उद्देश्य, जिसे एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (Access and Benefit Sharing - ABS) के रूप में जाना जाता है, यह सुनिश्चित करता है कि जब एक देश के आनुवंशिक संसाधनों (जैसे पौधों, जानवरों, सूक्ष्मजीवों) का उपयोग दूसरे देश या संस्था द्वारा अनुसंधान (research), विकास (development) या व्यावसायीकरण (commercialization) के लिए किया जाता है, तो प्रदाता देश (provider country) को इसके लाभों (मौद्रिक या गैर-मौद्रिक) में उचित हिस्सा मिले।
    • कैसे हासिल किया जाता है: यह पूर्व सूचित सहमति (Prior Informed Consent - PIC) और पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों (Mutually Agreed Terms - MAT) के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। नागोया प्रोटोकॉल (Nagoya Protocol) विशेष रूप से ABS को लागू करने के लिए विस्तृत नियम प्रदान करता है।
    • उदाहरण: यदि कोई विदेशी दवा कंपनी भारत के किसी विशेष औषधीय पौधे के आनुवंशिक संसाधन का उपयोग करके कोई नई दवा विकसित करती है, तो ABS सिद्धांतों के तहत, उस कंपनी को भारत (विशेष रूप से स्थानीय समुदाय, यदि लागू हो) के साथ लाभ (जैसे रॉयल्टी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण) साझा करने के लिए सहमत होना होगा। भारत का जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002) ABS को विनियमित (regulate) करने के लिए एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है।

ये तीनों उद्देश्य आपस में जुड़े हुए हैं और जैव विविधता के प्रभावी प्रबंधन के लिए एक समग्र दृष्टिकोण (holistic approach) प्रदान करते हैं।


CBD के तहत कौन से प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकॉल (international protocols) अपनाए गए हैं? उनका संक्षिप्त वर्णन करें।🔗

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CBD के तहत दो प्रमुख और कानूनी रूप से बाध्यकारी प्रोटोकॉल अपनाए गए हैं, जो कन्वेंशन के विशिष्ट पहलुओं को और अधिक विस्तार से संबोधित करते हैं:

  1. कार्टाजेना प्रोटोकॉल ऑन बायोसेफ्टी (Cartagena Protocol on Biosafety):

    • कब अपनाया गया: जनवरी 2000 में मॉन्ट्रियल (Montreal) में अपनाया गया और 11 सितंबर 2003 को लागू हुआ।
    • उद्देश्य: इस प्रोटोकॉल का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आधुनिक बायोटेक्नोलॉजी (modern biotechnology) के परिणामस्वरूप उत्पन्न जीवित संशोधित जीवों (Living Modified Organisms - LMOs) (जिन्हें जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म्स - GMOs भी कहा जाता है) के सुरक्षित हस्तांतरण (safe transfer), हैंडलिंग (handling), और उपयोग (use) को सुनिश्चित किया जाए, जो जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
    • मुख्य तंत्र (Key Mechanism): यह एडवांस इन्फॉर्म्ड एग्रीमेंट (Advance Informed Agreement - AIA) प्रक्रिया पर आधारित है। इसके तहत, एक निर्यातक देश (exporting country) को किसी LMO को पहली बार आयातक देश (importing country) में भेजने से पहले उस देश से स्पष्ट सहमति लेनी होती है। यह विशेष रूप से उन LMOs पर लागू होता है जिन्हें सीधे पर्यावरण में छोड़ा जाना है (जैसे बीज, मछली)।
    • बायोसेफ्टी क्लियरिंग-हाउस (Biosafety Clearing-House - BCH): यह सूचना साझा करने के लिए एक ऑनलाइन मंच (online platform) है, जो देशों को LMOs के बारे में वैज्ञानिक, तकनीकी, पर्यावरणीय और कानूनी जानकारी तक पहुंचने और निर्णय लेने में मदद करता है।
    • भारत का संदर्भ: भारत ने कार्टाजेना प्रोटोकॉल की पुष्टि की है और LMOs/GMOs को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (Environment (Protection) Act, 1986) के तहत बनाए गए नियमों के माध्यम से नियंत्रित करता है, जिसमें जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (Genetic Engineering Appraisal Committee - GEAC) एक प्रमुख नियामक संस्था है।
  2. नागोया प्रोटोकॉल ऑन एक्सेस टू जेनेटिक रिसोर्सेज एंड द फेयर एंड इक्विटेबल शेयरिंग ऑफ बेनिफिट्स अराइजिंग फ्रॉम देयर यूटिलाइजेशन (Nagoya Protocol on Access and Benefit-Sharing - ABS):

    • कब अपनाया गया: अक्टूबर 2010 में नागोया (जापान) में अपनाया गया और 12 अक्टूबर 2014 को लागू हुआ।
    • उद्देश्य: यह प्रोटोकॉल CBD के तीसरे उद्देश्य - एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) - को लागू करने के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा (legal framework) प्रदान करता है। यह आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच (access to genetic resources) और उनसे जुड़े पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge - TK) के उपयोग से होने वाले लाभों के निष्पक्ष और न्यायसंगत बंटवारे को सुनिश्चित करता है।
    • मुख्य प्रावधान (Key Provisions):
      • एक्सेस ऑब्लिगेशन्स (Access Obligations): संसाधन प्रदान करने वाले देशों (provider countries) को आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच के लिए स्पष्ट और पारदर्शी कानूनी निश्चितता (legal certainty) बनानी होगी।
      • बेनिफिट-शेयरिंग ऑब्लिगेशन्स (Benefit-Sharing Obligations): उपयोगकर्ताओं (users) को प्रदाताओं (providers) के साथ पूर्व सूचित सहमति (Prior Informed Consent - PIC) और पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों (Mutually Agreed Terms - MAT) के आधार पर लाभ (मौद्रिक और गैर-मौद्रिक) साझा करना होगा।
      • कम्प्लायंस ऑब्लिगेशन्स (Compliance Obligations): पार्टियां यह सुनिश्चित करने के उपाय करेंगी कि उनके अधिकार क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाले आनुवंशिक संसाधन दूसरे देशों के घरेलू ABS कानूनों के अनुसार प्राप्त किए गए हों। इसमें चेकपॉइंट्स (checkpoints) स्थापित करना शामिल हो सकता है।
      • पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge - TK): यह आनुवंशिक संसाधनों से जुड़े स्वदेशी और स्थानीय समुदायों (Indigenous and Local Communities - ILCs) के पारंपरिक ज्ञान के महत्व को स्वीकार करता है और इसके उपयोग से होने वाले लाभों के बंटवारे का प्रावधान करता है।
    • भारत का संदर्भ: भारत नागोया प्रोटोकॉल का एक हस्ताक्षरकर्ता (signatory) है। भारत का जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002) और इसके नियम नागोया प्रोटोकॉल के सिद्धांतों के काफी अनुरूप हैं और ABS के लिए एक विस्तृत नियामक ढांचा प्रदान करते हैं, जिसमें राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority - NBA), राज्य जैव विविधता बोर्ड (State Biodiversity Boards - SBBs), और जैव विविधता प्रबंधन समितियां (Biodiversity Management Committees - BMCs) शामिल हैं।

भारत के संदर्भ में CBD का क्या महत्व है और भारत इसे कैसे लागू करता है?🔗

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CBD भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि:

  • मेगाडाइवर्स देश (Megadiverse Country): भारत दुनिया के 17 मेगाडाइवर्स देशों में से एक है, जिसके पास दुनिया की लगभग 7-8% ज्ञात प्रजातियाँ हैं, जबकि भूमि क्षेत्र केवल 2.4% है। इसलिए, वैश्विक जैव विविधता के संरक्षण में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है।
  • आजीविका निर्भरता (Livelihood Dependence): भारत की एक बड़ी आबादी, विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी समुदाय, अपनी आजीविका (जैसे भोजन, चारा, ईंधन, दवा) के लिए सीधे जैव विविधता पर निर्भर हैं।
  • पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge): भारत में आनुवंशिक संसाधनों से जुड़ा समृद्ध पारंपरिक ज्ञान है, जिसके संरक्षण और लाभ बंटवारे के लिए CBD (विशेष रूप से नागोया प्रोटोकॉल) एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धता (International Commitment): भारत ने 1994 में CBD की पुष्टि की और इसके उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत में CBD का कार्यान्वयन (Implementation in India):

भारत ने CBD के प्रावधानों को लागू करने के लिए कई विधायी (legislative) और संस्थागत (institutional) कदम उठाए हैं:

  1. जैविक विविधता अधिनियम, 2002 (Biological Diversity Act, 2002 - BDA):

    • यह भारत का मुख्य कानून है जो CBD के उद्देश्यों, विशेष रूप से संरक्षण, सतत उपयोग और ABS को संबोधित करता है।
    • यह भारत के जैविक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान तक पहुंच को नियंत्रित करता है।
    • यह सुनिश्चित करता है कि आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों को निष्पक्ष और न्यायसंगत रूप से साझा किया जाए, खासकर स्थानीय समुदायों के साथ।
  2. त्रि-स्तरीय संस्थागत संरचना (Three-Tier Institutional Structure): BDA ने निम्नलिखित संरचना स्थापित की:

    • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority - NBA): चेन्नई में स्थित, यह राष्ट्रीय स्तर पर नियामक और सलाहकार निकाय है। यह विदेशी नागरिकों/संगठनों द्वारा जैविक संसाधनों तक पहुंच के अनुरोधों को मंजूरी देता है और ABS समझौतों की निगरानी करता है।
    • राज्य जैव विविधता बोर्ड (State Biodiversity Boards - SBBs): ये राज्य स्तर पर कार्य करते हैं और राज्य के भीतर भारतीय नागरिकों/संगठनों द्वारा वाणिज्यिक उपयोग के लिए जैविक संसाधनों तक पहुंच को नियंत्रित करते हैं। वे राज्य सरकारों को जैव विविधता मामलों पर सलाह देते हैं।
    • जैव विविधता प्रबंधन समितियां (Biodiversity Management Committees - BMCs): ये स्थानीय निकाय स्तर (जैसे पंचायत, नगर पालिका) पर गठित की जाती हैं। इनका मुख्य कार्य स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण, सतत उपयोग और दस्तावेजीकरण (documentation) करना है, जिसमें पीपुल्स बायोडाइवर्सिटी रजिस्टर्स (People's Biodiversity Registers - PBRs) तैयार करना शामिल है। PBRs स्थानीय जैविक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान का एक महत्वपूर्ण रिकॉर्ड हैं।
  3. राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (National Biodiversity Strategy and Action Plan - NBSAP): भारत ने अपनी NBSAP विकसित और अद्यतन (update) की है, जो राष्ट्रीय स्तर पर जैव विविधता लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक रोडमैप प्रदान करती है। भारत वर्तमान में अपनी NBSAP को कुनमिंग-मॉन्ट्रियल GBF के साथ संरेखित (align) कर रहा है।

  4. संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क (Protected Area Network): भारत के पास राष्ट्रीय उद्यानों (National Parks), वन्यजीव अभयारण्यों (Wildlife Sanctuaries), संरक्षण भंडारों (Conservation Reserves) और सामुदायिक भंडारों (Community Reserves) का एक विस्तृत नेटवर्क है, जो इन-सीटू संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

  5. विशिष्ट कार्यक्रम (Specific Programmes): प्रोजेक्ट टाइगर, प्रोजेक्ट एलिफेंट, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (National Mission for Clean Ganga) जैसे कार्यक्रम विशिष्ट प्रजातियों और इकोसिस्टम के संरक्षण पर केंद्रित हैं।

  6. ABS फंड (ABS Fund): BDA के तहत, लाभ बंटवारे से प्राप्त धन को राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर समेकित फंड (Consolidated Fund) में जमा किया जाता है, जिसका उपयोग जैव विविधता संरक्षण और लाभान्वितों (beneficiaries) के कल्याण के लिए किया जाता है।

इस प्रकार, भारत ने CBD को लागू करने के लिए एक व्यापक कानूनी और संस्थागत ढांचा तैयार किया है, हालांकि इसके प्रभावी कार्यान्वयन में चुनौतियां बनी हुई हैं, जैसे कि BMCs का क्षमता निर्माण, PBRs की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और ABS समझौतों का प्रभावी प्रवर्तन (enforcement)।

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